Description
मेरे प्रिय पाठकों एवं मित्रों,
मेरी ये पुस्तक एक प्रकार से मेरे ही अंदर के प्रकाश को प्रकाशित करने का श्रोत है। उस प्रकाश की किरणों को मैं आप सबके साथ साझा करना चाहती हूँ। गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए हम अपने आप से कैसे जुड़े रह सकते हैं इसी की ओर मेरी ये पुस्तक आप सबका ध्यान आकर्षित करना चाहती है। जैसे जब हम कोई अच्छी चीज़ कहते हैं या आप पहनते हैं तो हमारी सबसे पहली प्रतिक्रिया होती है कि हम सबको बताये। बस ऐसी ही बात कुछ मेरे साथ भी हुई। न जाने कितने उतार -चढ़ाव की जिंदगी को पार करते हुए मैं यहाँ ‘अपने साथ’ अपनी सखी बनकर खड़ी हूँ। आपका ‘अपने साथ’ होना अत्यंत आवश्यक है। इस भीड़-भाड़ की दुनिया में,पारिवारिक एवं सामाजिक गुत्थियाँ सुलझाते-सुलझाते हम खुद से दूर हो जाते हैं और फिर द्वैष, क्रोध के घेरे से घिर जाते हैं। अतः इन्द्रियों के प्रभाव से ये देह पीड़ित एवं रोगग्रस्त निश्चय ही होता है। मानसिक संवेदनायें होती जाती है। रिश्ते बिगड़ते जाते हैं।





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